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Badrinath Himalaya........How beautiful

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my favourite najm ---by Guljar

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर
उड़ते -फिरते हैं तितलियों की तरह
लफ्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नही
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा
बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी-----------------

saahil

साहिल पर खड़े हुए
सरकती रेत क़दमों के नीचे से
जैसे वक्त सरकता जाए मुट्ठी से
दूर क्षितिज पर एक सितारा
आसमान पर टंके ये लम्हे ,पलछिन
यही सच है
शेष है भ्रम --
गुजरता वक्त जिन्दगी का सच है
प्रतिपल बढ़ते कदम ,एक अनजान डगर पर
जिसके आगे पूर्णविराम
चिरनिद्रा चिर्विश्राम !!!