फागुन आया उड़ रहा अबीर और गुलाल होली में सब मस्त हुए किसका पूछे हाल बसंती रंगो में डूबे खिला हास परिहास फागुन में मदमस्त हुए सब छाया उल्लास सरसों फूली टेसू महका खिला हरसिंगार पीली चुनर ओढ़करप्रकृति ने किया श्रृंगार .
रात भर डूबता उगता रहा इक ख्वाब तुम्हारी आँखो से गिरा मेरी पलकों पे सजा रात भर दूधिया चाँदनी में घुलता रहा एक ख़वाब.... पेड़ों के पीछे-चाँद के साथ साथ- बादलों के संग चलता रहा एक ख़वाब..... ओस से गीला ठंड में दुबका सपनो की चादर बुनता रहा एक ख़वाब.........
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mere blog par aane ka dhanywad...