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Showing posts from December, 2007

swar

तुहिन कणों में हास्य मुखर
सौरभ से सुरभित हर मंजर
रंगो का फैला है जमघट
मूक प्रकृति को मिले स्वर
बाहर कितना सौन्दर्य बिखरा
पर अंतर क्यों खाली है
काश कि ये सोन्दर्य सिमट
मुझमे भर दे उल्लास अमिट

ahasas

उम्र के केनवास पर
वक़्त बनाता गया कुछ धुंधले अक्स
उभरते रहे आकार
चित्रित होते रहे इन्द्रधनुषी रंग
उम्र के कागज पर ,
वक़्त लिखता रहा अपनी इबारत ...
एहसास कि स्याही से
अनुभव कि कलम से
उम्र के कागज पर -
वक़्त करता रहा अपने हस्ताक्षर
अंकित होते रहे कुछ नाम....